राधिका की डायरी "रात का सफर और संकल्पों की उड़ान: ३०० किलोमीटर का नया इम्तिहान"
राधिका की डायरी "रात का सफर और संकल्पों की उड़ान: ३०० किलोमीटर का नया इम्तिहान" पंडित जी का साथ मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं था। जहाँ सफर दुर्घटनाओं और अनिश्चितताओं से भरा हो, वहाँ अगर कोई हाथ थामने वाला मिल जाए, तो रास्ता आसान लगने लगता है। दिन भर बैक-टू-बैक तीन मीटिंग्स करने के बाद शरीर टूट रहा था, लेकिन मन में एक अजीब सा उत्साह था। पंडित जी न केवल मेरा मार्गदर्शन कर रहे थे, बल्कि एक सुरक्षा कवच की तरह मेरे साथ थे। शाम को उनके किसी परिचित के यहाँ हमने तसल्ली से भोजन किया। वह आत्मीयता और खाने का स्वाद मेरी सारी थकान हर ले गया। लेकिन आराम के लिए अभी वक्त नहीं था। रात के ठीक 10 बजे हम बस में सवार हुए। सामने 300 किलोमीटर का लंबा सफर था और सुबह होते ही फिर से वही भागदौड़—अगले दिन का शेड्यूल 3 से 4 मीटिंग्स से भरा हुआ था। बस की खिड़की से बाहर अंधेरे को चीरती सड़कों को देखते हुए मैंने सोचा, "यह संघर्ष सिर्फ मेरा नहीं है, यह उन सपनों का है जिन्हें मैं हकीकत में बदलना चाहती हूँ।" पंडित जी की मौजूदगी ने मुझे यह हौसला दिया कि जब इरादे नेक हों, तो ईश्वर भी किसी न किसी...